डूब जाता हूँ जब तेरे रस में

मैं नहीं रहता फिर मेरे बस में

उन के होंठों को चूमने के लिए
तितलियाँ लड़ रही हैं आपस में

ज़िन्दगी वो सवाल पूछेगी
जो नहीं है मेरे सिलेबस में

हुक्मराँ था कभी जो जंगल का
काम करने लगा है सर्कस में

इश्क़ से जो वफ़ा निभाते हैं
एक-दो होते हैं फ़क़त दस में

जब से देखा है आप का चेहरा
कुछ कमी आ गई है फ़ोकस में

— Rehan Mirza

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