चाँद, सूरज और बादल देखकर
हँस रहा था एक पागल देखकर
मैं समझता हूँ जूनून-ए-इश्क़ भी
दौड़ पड़ता हूँ मैं जंगल देखकर
वो शिकारी पहले इंसाँ था तभी
रो दिया था मुझको घायल देखकर
वो उठाएगा नज़र तो कोई भी
डूब जाएगा वो दलदल देखकर
लम्स तक उसके बदन का याद है
उसकी याद आती है मख़मल देखकर
हीरे तक के भाव कम होने लगे
उसकी वो चाँदी की पायल देखकर
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