चाँद, सूरज और बादल देख कर

हँस रहा था एक पागल देख कर

मैं समझता हूँ जुनून-ए-इश्क़ भी
दौड़ पड़ता हूँ मैं जंगल देख कर

वो शिकारी पहले इंसाँ था तभी
रो दिया था मुझ को घाइल देख कर

वो उठाएगा नज़र तो कोई भी
डूब जाएगा वो दलदल देख कर

लम्स तक उस के बदन का याद है
उस की याद आती है मख़मल देख कर

हीरे तक के भाव कम होने लगे
उस की वो चाँदी की पायल देख कर

— Siddharth Saaz

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