उस ने हमारी जानिब देखा तो कम बनेंगे

पर ये नहीं हुआ तो लाखों ही ग़म बनेंगे

दिन रात मैं इसी में रहता हूँ मुब्तला, कब
चौख़ट पे मेरे घर की उस के कदम बनेंगे

उस की छुअन को यारों ये मो'जिज़ा अता है
रख दे जहाँ भी पाओं बाग़-ए-इरम बनेंगे

हिजरत के, राब्तों के, इंसानी चाहतों के
उस से ही पूछकर तो सारे नियम बनेंगे

उस जैसे हम कहीं से थोड़ा भी बन सके तो
ये लिख के दे रहे हैं, उस की क़सम, बनेंगे

— Siddharth Saaz

More by Siddharth Saaz

Other ghazal from the same pen

See all from Siddharth Saaz →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling