हमारे शहर में बे-वक़्त जो ये बारिश है
तुम्हारी आँखों की और गेसुओं की साज़िश है
ज़बाँ-दराज़ ख़िलाफ़-ए-जुनून बोलता है
इसी वजह से मिरी उस बशर से रंजिश है
अगर उसे कभी छूना तो सोचकर छूना
वो एक जिस्म नहीं है वुजूद-ए-आतिश है
हमारे बन के किसी दूसरे के मत होना
हमारी आपसे ये आख़िरी गुज़ारिश है
ये किस जगह पे मुझे ले के आ गए हो 'शजर'
हर एक सिम्त यहाँ हुस्न की नुमाइश है
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