कोई शय हस्ब-ए-ज़रूरत नहीं मिल पाएगी
ये हक़ीक़त है हक़ीक़त नहीं मिल पाएगी
जिस्म मिल जायेगा दौलत से ज़माने में मगर
आपको सच्ची मोहब्बत नहीं मिल पाएगी
'इश्क़ के सज्दे अगर जीते जी कर दोगे क़ज़ा
तो तुम्हें इज़्ज़त-ओ-शोहरत नहीं मिल पाएगी
इतने ग़म तोहफ़े में दे देगी मोहब्बत तुमको
'उम्र भर रोने से फ़ुर्सत नहीं मिल पाएगी
ऐसा लगता है शजर चेहरा-ए-रौशन की तेरे
मुझको जीते जी ज़ियारत नहीं मिल पाएगी
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