महव-ए-दुआ है रब से यूँँ सारा जहाँ ना हो
हम जैसा कोई दूसरा तिश्ना दहाँ ना हो
बेताब फिर तू आज दिल-ए-ना-तवाँ ना हो
मैं चाहता हूँ दर्द-ए-मोहब्बत अयाँ ना हो
लैला दुआएँ करती है रब से ये 'इश्क़ में
बर्बाद मेरे क़ैस सा कोई जवाँ ना हो
बिंत-ए-फ़ुलाँ ने बिंत-ए-फ़ुलाँ से कहा सुनो
इब्न-ए-फ़ुलाँ हो बज़्म में इब्न-ए-फ़ुलाँ ना हो
सब ख़्वाब दश्त-ए-चश्म में उर्यां पड़े रहें
कोई भी इनके हाल पे नौहा-कुनाँ ना हो
जल जाएँ दिल की बस्ती में सब 'इश्क़ के मकाँ
और उसके बाद बस्ती में मुर्शीद धुआँ ना हो
जिस को अमाँ हुई है मयस्सर वो ख़ुश रहे
वो क्या करे के जिसको मयस्सर अमाँ ना हो
मज़लूम पर जो दुनिया में ज़ुल्म-ओ-सितम करे
मज़लूमियत पे शह की वो गिर्या-कुनाँ ना हो
आँखों के रास्ते से मिरे दिल में आए तू
फिर मोजिज़ा ये हो की तिरा नक़्श-ए-पाँ ना हो
मेरी तरह से राज़ तिरे आश्कार हों
मेरी तरह से कोई तिरा राज़-दाँ ना हो
मिल जाए जिसको कू-ए-सनम बा-ख़ुदा शजर
उसको कभी भी ख़्वाहिश-ए-बाग़-ए-जिनाँ ना हो
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