'उम्र भर दश्त की अब ख़ाक उड़ाओ जाओ
अपनी बर्बादी का तुम जश्न मनाओ जाओ
हम ही रावी हैं मुहब्बत के हर इक क़िस्से के
हम को आदाब-ए-मुहब्बत न सिखाओ जाओ
सर-ज़मीन-ए-दिल-ए-नादाँ से मुहब्बत के सभी
अपने हाथों से चलो नक़्श मिटाओ जाओ
मिल्कियत हैं ये मेरे चश्म तुम्हारी हमदम
सो तुम्हें हक़ है मिरे ख़्वाब में आओ जाओ
मक़तल-ए-इश्क़ में सर पेश करो ख़ुश होकर
तुम शजर इज़्ज़त-ए-सादात बचाओ जाओ
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