जुनून चीख़ चीख़ कर ये कहता है जुनून से
शब-ए-फ़िराक़-ए-यार में दिये जलाओ ख़ून से
यक़ीन कर ये 'इश्क़ के नगर में एक पल कभी
दिल-ए-ग़रीब-ए-ख़स्ता-तन रहा नहीं सुकून से
हमारे दिल की सारी नेक हाजते क़ुबूल कर
मिला दे माह-ए-जनवरी इलाही माह-ए-जून से
मुझे ये एतिबार है तू देख लेना एक दिन
मैं आब-जू निकाल दूँगा कोह-ए-बे-सुतून से
कहा ये हर्फ़-ए-ख़े ने बढ़ के हर्फ़-ए-वाव से शजर
करो अब इख़्तिताम-ए-लफ़्ज़-ए-ख़ून हर्फ़-ए-नून से
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