कौन जाने कि रो रहे थे हम
ग़र्क़ दरिया में हो रहे थे हम
पा रहे थे इक आफ़त-ए-दिल को
इस तरह ख़ुद को खो रहे थे हम
कौन कब कब्र से उठा लाया
चैन से यार सो रहे थे हम
— Sumit Panchal
ग़र्क़ दरिया में हो रहे थे हम
पा रहे थे इक आफ़त-ए-दिल को
इस तरह ख़ुद को खो रहे थे हम
कौन कब कब्र से उठा लाया
चैन से यार सो रहे थे हम
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