हम को सब दीवानों ने समझाया है

जिस्म नहीं है यार मोहब्बत साया है

उसे देख कर पूछ रहा हूँ रब से मैं
सात दिनों में कैसे उसे बनाया है

हम तो दरिया हैं तू ने उतना जाना
तेरे घड़े में जितना पानी आया है

नाच रहे हैं मोर जेठ दोपहरी में
उस की ज़ुल्फ़ों ने पानी बरसाया है

वो इज़हार ए इश्क़ पे मुझ से कहती थी
पागल है क्या गांजा पी कर आया है

गहरे लोगों ने देखी गहरी बातें
सस्ता दर्शक सस्ती आँखें लाया है

— Vishnu virat

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