तारीख़ है गवाह की ऐसा नहीं किया

हम शाइरों ने प्यार में धोखा नहीं किया

फिर तुम बिना जो काट दी तन्हा ही काट दी
कितनी कड़ी ही धूप में रिक्शा नहीं किया

फिर मुस्कुराए साँस ली ख़ुश भी रहे हो तुम
तुम ने हमारे बा'द में क्या क्या नहीं किया

मेरे बुजुर्गों ने मुझे ग़ुरबत तो की अता
लेकिन किसी भी शाह को पंखा नहीं किया

ये झूठ मेरा बोलना तुम को किया न याद
उस का भवों को तान के कहना नहीं किया

पागल न कर सका ये तेरा इश्क़ भी मुझे
इस ज़हर ने भी जिस्म को नीला नहीं किया

उस्ताद थी वो इश्क़ की यूँ तो बड़ी मगर
ठीक उस ने मेरा एक भी मिसरा नहीं किया

— Vishnu virat

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