अब किसी से तो क्या शिकवा है
जब ख़ुद से अपना शिकवा है
इतना सब कुछ मिलने पर भी
रब से दुनिया का शिकवा है
दहेज़ छोड़ो बेटी दे दी
अब और साहब क्या शिकवा है
याद बहुत आते हो अब तुम
ये उस का कैसा शिकवा है
जिस की गोद में सर रखते थे
अब उस से मिलना शिकवा है
उन की नज़र से देखो मुझ को
तो क़तरा क़तरा शिकवा है
अब लड़ता फिर रहा मैं उस से
ज़हर न खाने का शिकवा है
— Karan Shukla















