
सियासत खेल जैसी है हमारा और तुम्हारा क्या
बड़ी गहरी बड़ी उलझी नहीं रखती किनारा क्या
मुझे पागल सभी लगते झगड़ते जो बिना मतलब
तुम्हें कुर्सी नहीं मिलनी तुम्हें अब भी सहारा क्या
— Atul Yadav Nirbhay
Other sher from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling