ये जो चेहरे पे शादमानी है

आप लोगों की मेहरबानी है

रब की मर्ज़ी है जिस तरह बीते
अपनी उस तौर-ए-ज़िंदगानी है

कौन हँसता है उम्र भर यारो
कुछ पलों की ही शादमानी है

दौर ऐसा कि शर्म आ जाए
हाए क्या चीज़ अब जवानी है

क्या हुआ वो न मिल सकी मुझ को
इश्क़ मेरा तो जावेदानी है

उस की यादों पे शे'र कहता हूँ
ये तरीक़ा ही ग़म-बयानी है

— Aktar ali

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