तुम्हारे शहर के गरजे हुए थे
हमारे गाँव में बरसे हुए थे
तेरे बादल से उम्मीदें थीं लेकिन
हमारे खेत भी तरसे हुए थे
न फिर ख़ुद को कभी सुलझा सके वो
जो तेरी ज़ुल्फ़ से उलझे हुए थे
सुना है अब वो बेटी चाहती है
वो जिस की कोख से बेटे हुए थे
वो चेहरा अब भी याद आता है 'अंकित'
वो जिस को देख कर अंधे हुए थे
— Ankit Yadav















