कुछ इस अदास आज मेरी ओर देखती है वो
कि लग रहा है मुद्दतों के बाद में मिली है वो
वो सोचती है मेरा पहला पहला 'इश्क़ है मगर
अब उस से क्या कहूँ कि मेरा जिस्म आख़िरी है वो
मैं पहले उसकी ज़ुल्फ़ की हर इक गिरह को खोल दूँ
फिर उसके दरमियाँ गुज़र के देख लूँ नदी है वो
गुज़र रहा हूँ मैं बदल बदल कर अपने रास्ते
पलट के देखता हूँ तो उसी जगह खड़ी है वो
वो बेशक़ीमती समझ रही है अपने आप को
अगर समझ रही है फिर तो बेशक़ीमती है वो
नज़र में 'इश्क़ है मगर ज़बान पर नहीं नहीं
वो मुॅंह पे झूठ बोलता है कैसा आदमी है वो
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