फिर याद तेरी लाई है मौसम बहार के
फूलों पे चल रहा हूँ मैं चप्पल उतार के
सहरा परस्त लोग थे मिट्टी के ओंठ से
मंज़र दिखा रहे थे मुझे आबशार के
उठने लगा है पर्दा तेरी काइनात का
खुलने लगे हैं ग़म भी सभी ग़म-गुसार के
जो जा रहा है शख़्स ये है शख़्स आख़िरी
बुझने लगेंगे अब दिए मेरी मज़ार के
आशुफ़्तगी निगल गई दुनिया के सारे रंग
क़िस्से सुना हमें तू कोई ख़ुल्द-ज़ार के
ओ सुन ज़रा अवेस ओ सय्यद अवेस सुन
सदक़े उतार दूँ मैं तेरे पुर-वक़ार के
— Aves Sayyad















