आप को देख कर देखता रह गया

क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

बात क्या है कि सब ग़र्क़-ए-दरिया हुए
इक ख़ुदा रह गया नाख़ुदा रह गया

सोच कर आओ कू-ए-तमन्ना है ये
जान-ए-मन जो यहाँ रह गया रह गया

दिल के वहशत-सरास ख़ुदा जाने क्यूँ
सब गए एक दाग़-ए-वफ़ा रह गया

उन की आँखों से कैसे छलकने लगा
मेरे होंटों पे जो माजरा रह गया

ऐसे बिछड़े सभी रात के मोड़ पर
आख़िरी हम-सफ़र रास्ता रह गया

— Aziz Qaisi

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