Meaning of

क़ुम

qum • قم

उठना; खड़ा होना; जागना

rise; stand up; awaken

اٹھنا; کھڑا ہونا; جاگنا

Arabic

मैं आ रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का
सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

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ये तेरे ख़त ये तेरी ख़ुशबू ये तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ हैं तेरे कौल और क़सम की तरह

गुज़िश्ता साल मैं ने इन्हें गिनकर रक्खा था
किसी ग़रीब की जोड़ी हुई रक़म की तरह

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आप मुझ को बहुत पसंद आईं
आप मेरी क़मीज़ सीजिएगा

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तुझे ख़याल नहीं है सो हम बढ़ा रहे हैं
फिर इक दफ़ा तेरी ज़ानिब क़दम बढ़ा रहे हैं

बहुत से आए तुझे जीतने की ख़्वाहिश में
हम एक कोने में बैठे रक़म बढ़ा रहे हैं

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मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
बर्क़ सी गिर गई काम ही कर गई आग ऐसी लगाई मज़ा आ गया

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न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

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हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

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ब-जुज़ ख़ुदा के किसी का हम पे करम नहीं है ये कम नहीं है
किसी का सजदा जबीं पे अपनी रक़म नहीं है ये कम नहीं है

हमारी चुप्पी ये है ग़नीमत वगरना ये जो किया है तुम ने
यक़ीन मानो हमारा माथा गरम नहीं है ये कम नहीं है

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मैं आ रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का
सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

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हज़ारों क़ुमक़ुमों से जगमगाता है ये घर लेकिन
जो मन में झाँक के देखूँ तो अब भी रौशनी कम है

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मैं आ रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का
सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

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ये तेरे ख़त ये तेरी ख़ुशबू ये तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ हैं तेरे कौल और क़सम की तरह

गुज़िश्ता साल मैं ने इन्हें गिनकर रक्खा था
किसी ग़रीब की जोड़ी हुई रक़म की तरह

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'क़ुम' शब्द नींद या निष्क्रियता से उठने की छवि प्रस्तुत करता है। अपने मूल अर्थ में, यह शारीरिक गति को दर्शाता है, आराम से गतिविधि की ओर संक्रमण। कविता ने इस शब्द को आत्मा और मन के जागरण का प्रतीक बना लिया है, जो विपत्ति के खिलाफ उठने का आह्वान करता है।

'क़ुम' का उपयोग कवि क्रिया और दृढ़ता को प्रेरित करने के लिए करते हैं। यह अक्सर उन पंक्तियों में आता है जो किसी की क्षमता के जागरण या उत्पीड़न के खिलाफ उठने का आह्वान करती हैं। यह शब्द स्थिरता के विपरीत है, गति और परिवर्तन का आग्रह करता है।

कविता में, 'क़ुम' उठने का आह्वान है, एक संभाव्यता की फुसफुसाहट जो साकार होने की प्रतीक्षा कर रही है।