ग़ैर मुमकिन है कोई तुझ से सरोकार न हो
कौन सी शय है कि जिस
में तिरा दीदार न हो
मैं ने इक शख़्स को तेरी ही तरह चाहा है
या ख़ुदा मुझ सा भी दुनिया में गुनहगार न हो
आज हँस कर जो मिले है वो इसे क्या समझूँ
दिल ये कहता है कि बे-मौसमी बौछार न हो
ऐसे लम्हे भी मुहब्बत में कभी आते हैं
बात होठों पे हो और क़ुव्वत-ए-गुफ़्तार न हो
जज़्बा-ए-इश्क़ जो दिल में है सलामत रहे वो
मेरे आँगन का ये पौधा कभी बीमार न हो
ख़ौफ़ आता है 'सबा' सोच के दिल का आलम
जब वो बाज़ार में हो और ख़रीदार न हो
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