अगर ज़िंदा हमें रखना मुहब्बत की रवानी है
सुनो यारो ये ज़िम्मेदारी हम को ही उठानी है
कहानी मुख़्तसर होती तो आसानी से कह देता
बयाँ कैसे करूँँ ख़ुद को मिरी लंबी कहानी है
यकायक हो गई मुझ को मुहब्बत हो गई मुझ को
किसी ने सच कहा था ये बला-ए-ना-गहानी है
सो अब तन्हाई में ख़ुद से बस इतनी बात कहता हूँ
जिओ खुल कर न जाने 'जून' कितनी ज़िंदगानी है
As you were reading Shayari by 'June' Sahab Barelvi
our suggestion based on 'June' Sahab Barelvi
As you were reading undefined Shayari