गिरह हया की अगर पैरहन को लग जाए
तो अहमियत का पता हर बदन को लग जाए
अब इतनी भी न दिखा दिलरुबाई तू सब को
कि चश्म-ए-बद तिरे माशूक़-पन को लग जाए
यूँँ बे-लिबास हुआ कर न सामने मेरे
नज़र मिरी न तिरे गुल-बदन को लग जाए
ग़ज़ल मैं कर दूँ मुकम्मल मगर ये मिस्रा-ए-तर
ख़ुदा करे कि गिरह इक सुख़न को लग जाए
मेरे भी फ़न के दिखें मोजिज़े अगर जानाँ
तेरे सुख़न की नज़र मेरे फ़न को लग जाए
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