sehra ko dariyaa samjha tha | सहरा को दरिया समझा था

  - Khalid Moin

सहरा को दरिया समझा था
मैं भी तुझ को क्या समझा था

हाथ छुड़ा कर जाने वाले
मैं तुझ को अपना समझा था

फिर जाऊंगा अपनी ज़बां से
क्या मुझ को ऐसा समझा था

इतनी आंख तो मुझ में भी थी
दुनिया को दुनिया समझा था

मैं ने तुझ को मंज़िल जाना
तू मुझ को रस्ता समझा था

बे-आईना शहर ने मुझ को
ख़ुद सा बे-चेहरा समझा था

क्या से क्या निकला है, तू भी
मैं तुझ को कैसा समझा था

  - Khalid Moin

Aawargi Shayari

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