अरसे से ढूँढ़ रहा हूँ मैं ये ख़्वाबीदा शे'र
छिप के बैठे हैं किताबों में जो बोसीदा शे'र
सिर्फ़ आँखों का नशा काम नहीं आएगा
जाम के साथ मुझे चाहिए संजीदा शे'र
हार जाना मिरी फ़ितरत में नहीं जान-ए-जाँ
तीर की नोक पे रखता हूँ मैं पेचीदा शे'र
शा'इरी से कभी मैं दूर नहीं जा सकता
बाप की याद दिलाते हैं ये संजीदा शे'र
मुझको सहरा तो कभी मार नहीं पाएगा
रक़्स करते हैं निगाहों में ये नम-दीदा शे'र
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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