पहले बहता हुआ आँखों से समुंदर देखें
या चमकता हुआ उस
में कोई गौहर देखें
सर पटकने से कभी पाप धुलेंगे तो नहीं
अब किसी प्यासे को पानी ही पिला कर देखें
घर की दीवारें सजा तो ली हैं शीशों से पर
ख़ुद को दुनिया से छिपाएँ या मुक़द्दर देखें
कब तलक राह में ही बैठे रहेंगे हम लोग
देर करने से तो अच्छा है कि चल कर देखें
एक तो वक़्त का पहले से तक़ाज़ा है बहुत
अब कोई शे'र सुनाएँ या मुकर्रर देखें
रक़्स करता हुआ बस आप ने बंदर देखा
उस मदारी का छिपाया हुआ नश्तर देखें
आप ने तो है फ़क़त हिज्र का दल-दल देखा
इक दफ़ा तो किसी मुफ़लिस का मुक़द्दर देखें
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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