jab kabhi main apne andar ke gumaan ko dekhta hooñ | जब कभी मैं अपने अंदर के गुमाँ को देखता हूँ

  - Harsh Kumar Bhatnagar

जब कभी मैं अपने अंदर के गुमाँ को देखता हूँ
जो सफ़र में साथ था उस हम-नवाँ को देखता हूँ

मैं बदलते मौसमों में दुख बताता हूँ शजर को
टूट जाता है मिरा दिल जब ख़िज़ाँ को देखता हूँ

फ़ेर लेता हूँ दहन कुछ इसलिए भी इश्क़ से मैं
बज़्म में अब वहशतों के कारवाँ को देखता हूँ

यूँँ तो पहले देखता हूँ आइने में अक्स अपना
फिर ज़माने की नज़र से मैं जहाँ को देखता हूँ

शाख़ से फूलों के जैसे टूटता हूँ इस क़दर मैं
पूरा दिन जब काम करती अपनी माँ को देखता हूँ

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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