जब कभी मैं अपने अंदर के गुमाँ को देखता हूँ
जो सफ़र में साथ था उस हम-नवाँ को देखता हूँ
मैं बदलते मौसमों में दुख बताता हूँ शजर को
टूट जाता है मिरा दिल जब ख़िज़ाँ को देखता हूँ
फ़ेर लेता हूँ दहन कुछ इसलिए भी इश्क़ से मैं
बज़्म में अब वहशतों के कारवाँ को देखता हूँ
यूँँ तो पहले देखता हूँ आइने में अक्स अपना
फिर ज़माने की नज़र से मैं जहाँ को देखता हूँ
शाख़ से फूलों के जैसे टूटता हूँ इस क़दर मैं
पूरा दिन जब काम करती अपनी माँ को देखता हूँ
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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