ख़ुफ़्ता नसीब और ज़माने की मस्लहत
इस पाँव को ज़रूरी है जूते की मस्लहत
जो दर्द से गुज़र रहा है जानता है ग़म
बहरे ने इसलिए है ली गूँगे की मस्लहत
हर लफ़्ज़ के यहाँ पे मआनी हज़ार हैं
लेते कभी कभार हैं नुक़्ते की मस्लहत
ख़ुद ऊँट भी भटक रहे हैं जा-ब-जा वहाँ
कैसे मिलेगी आप को साए की मस्लहत
दीवार मत गिरा मिरे ख़्वाबों की जान-ए-जाँ
पहले ही ले चुका हूँ मैं क़र्ज़े की मस्लहत
इन आँसुओं से सिर्फ़ वरक़ ही भरे गए
ऐ काश लेता मैं किसी शाने की मस्लहत
बंदा भी इक मशीन की मानिंद है ख़ुदा
चलता नहीं बिना किसी पुर्ज़े की मस्लहत
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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