tabeeb ne mire zaKHmon ko jab nakar diya | तबीब ने मिरे ज़ख़्मों को जब नकार दिया

  - Harsh Kumar Bhatnagar

तबीब ने मिरे ज़ख़्मों को जब नकार दिया
ये दुश्मनों ने सुना और मुझको मार दिया

हर एक माँ से है बस एक ही सवाल मिरा
कि उनको बदले में दुनिया ने उतना प्यार दिया

मैं डूबते हुओं को जब बचाने को निकला
मुझे सफ़ीने से मल्लाह ने उतार दिया

वगरना आज भी नज़रें चुराया करते लोग
वो इक हसीना के ग़म ने मुझे सँवार दिया

सवाल मुझ सेे वो हर दम हज़ार करती है
मैं सोचता हूँ उसे क्यूँ ही इख़्तियार दिया

मैं उसके वास्ते दुनिया को छोड़ आया तब
वो हम-नशीं ने मुझे अपना एतिबार दिया

पिता को कह दिया जब क्या किया है मेरे लिए
ख़ुदा ने तब मुझे जन्नत से ही नकार दिया

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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