वो कैसे काटते हैं ज़िंदगी बग़ैर शिफ़ा
हमें यक़ीं है वो होंगे दुखी बग़ैर शिफ़ा
तमाम शब ये लगा आज टूट जाऊँगा
मगर मैं जी रहा हूँ वाक़ई बग़ैर शिफ़ा
उन्हीं के ख़ून में होती है सहने की हिम्मत
जो लोग काटते हैं मुफ़्लिसी बग़ैर शिफ़ा
तो सोच लेना कि अब रोकना नहीं आसाँ
ये साँस चलती रही गर मिरी बग़ैर शिफ़ा
— Harsh Kumar Bhatnagar















