वो गेसू-ए-रसा में पहले ज़ेर-ए-दाम करता है
फ़ज़ा में बिखरा कर वो मुझको फिर बदनाम करता है
परिंदे की तरह पहले अदब से पालता है वो
बड़ा होने पे फिर बाज़ार में नीलाम करता है
दिल-ए-नाकाम वालों से तो याराना है तेरा पर
मोहब्बत करने वालों को तू क्यूँ बदनाम करता है
ख़िज़ाँ में वो शजर के साथ अपना ग़म मनाता है
वसंत आते ही जंगल काटने का काम करता है
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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