हैं तसव्वुर बहुत बताऊँ क्या
शे'र लिखके तुम्हें सुनाऊँ क्या
ख़ौफ़ ऐसे उन्हें सताए है
डर गए सब तुम्हें दिखाऊँ क्या
हूर है वो किया यक़ीं सबने
देख के ख़ुद को भूल जाऊँ क्या
शे'र होगा कोई गली का वो
रोज़ इंसानियत सिखाऊँ क्या
हर जगह मसअला जगह का है
आसमाँ में नगर बसाऊँ क्या
हुस्न को नाज़नीं हमीं कहते
नज़्म में फिर उसे सजाऊँ क्या
रात चर्चे बहुत हुए तेरे
दिन में तारे ज़मीं पे लाऊँ क्या
— Manohar Shimpi















