umooman 'ishq hi mazhab rahe sab ke agar dil men | उमूमन 'इश्क़ ही मज़हब रहे सब के अगर दिल में

  - Manohar Shimpi

उमूमन 'इश्क़ ही मज़हब रहे सब के अगर दिल में
कोई तन्हा कहाँ दिखता कभी भी यार महफ़िल में

हसीं सी ज़िंदगी जी लो ख़ुशी से और दिल से ही
जिए जो मुस्कुरा के ही कहाँ वो बात बुज़दिल में

दिखे जुगनू चमकते जब कभी तब रात ही होती
कहीं गुम तुम न हो जाओ सितारों की ही झिलमिल में

जुदाई का सफ़र मुश्किल कहाँ होता नहीं समझो
लगे गहराइयों से जब पता दुख क्यूँ न हो दिल में

फ़ज़ा की गर्द में देखी झलक भी याद है मुझ को
नज़ाकत और ही तो थी बसी जो है दिलो-दिल में

ग़ज़ल में जिक्र बरसों से उसी ही दौर का होता
लिखे अश'आर फिर दिल से पढ़े भी ख़ूब महफ़िल में

रहा तन्हा कभी चलते हुए ही क्यूँँ समंदर सा
कई तूफ़ान आते हैं 'मनोहर' देख साहिल में

  - Manohar Shimpi

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