रोज़ जुगनू ही कहाँ उड़ते नज़र आते हैं
गेसुओं पर देखके लम्हे गुज़र जाते हैं
महज़ आँखों में तेरे हम भूल सब जाते हैं
तेरे नैना वो करारे ही नज़र आते हैं
ख़्वाब हमने भी कभी तो तेरे देखे ही थे
महज़ सारे क्यूँ उसी शब में बिखर जाते हैं
हाल तेरा काश थोड़ा हम समझ भी पाते
दोस्त होते दफ़'अतन तेरी ख़बर लाते हैं
साथिया ये हाल तूने क्या किया है उनका
'इश्क़ में अब वो भरोसा ही न कर पाते हैं
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