शजर आँगन में फूलों से महकता है
परिंदों से वही हर दिन चहकता है
लकड़हारा उसे क्यूँँ काटता यारों
इसी हालात से दिल भी दहकता है
दरीचे से परिंदा झाँकता देखो
बयारों संग डाली पर चहकता है
सफ़र उसका करे तय आदमी ही क्यूँँ
उसे जब देखके चलता बहकता है
किसी के भी कभी भी काम ही आता
'मनोहर' इसलिए भी दिल दहकता है
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