त'अल्लुक़ असरदार होता
उसी से सरोकार होता
समंदर न उस-पार होता
बिना मौज बेकार होता
अगर साथ तेरा न मिलता
सफ़र ख़ूब दुश्वार होता
जहाँ साथ रहते क़रीबी
वहाँ ख़ूब घर-बार होता
ग़लत जब छपे दास्तांँ तो
वही फिर न अख़बार होता
हिना से जहाँ रंगता सब
उसी से हमें प्यार होता
तसव्वुर अगर सच लगे है
उसी से अदाकार होता
अगर है रवानी 'मनोहर'
कहाँ जोश बेकार होता
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