बहर कितनी सदी से ये पुरानी है
सिर्फ़ मिसरे नहीं ये ज़िंदगानी है
'इश्क़ में हिज्र की कोई कहानी है
दूर तुम सेे रहे तब बात जानी है
भागते ही रहे ता'उम्र हम सारे
रोब कैसा उसी से ख़ुश-गुमानी है
बात जो थी बयारों ने कहाँ मानी
'इश्क़ तो है कहाँ उस में रवानी है
दख़्ल देना कहाँ फ़ितरत उसी की है
क़हर लगता अभी ये आसमानी है
उन पलों में अभी भी क्या रखा क्या है
खेलते कूदते बीती जवानी है
मसअला और ही तो था 'मनोहर' तब
जंग अब जो लड़े हैं वो ज़बानी है
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