शब-ओ-रोज़ कैसे नज़र हो ही जाती
निगाहों में उस के पहर हो ही जाती
कभी वो मुझे तो दरीचे से दिखती
ग़ज़ब की बला है नज़र हो ही जाती
मुहब्बत कभी किस तरफ़ मोड़ लेती
रह-ए-इश्क़ से ही बसर हो ही जाती
कभी तुम ये पूछो न मासूम दिल से
उसे देखके फिर सहर हो ही जाती
अगर साथ मिलता सदा के लिए ही
सफर में 'मनोहर' बसर हो ही जाती
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