कभी बे-हिसाब मिला करो कभी इंतज़ार किया करो
यूँँ ही ख़ौफ़ के ही बग़ैर मुझ पे भी ऐतबार किया करो
वो कभी नवाज़ ही दे कहीं उसी इक नज़र से अगर मुझे
ये फ़िज़ा समा भी कहे ख़ुदास भी ख़ूब प्यार किया करो
कोई शे'र मुझ पे लिखा करो उसे बज़्म में भी पढ़ो कभी
मेरे ख़्वाह से जो सजे ग़ज़ल तभी आर पार किया करो
कि अवाम भी तो रिवाज के न मिलाप के ही ख़िलाफ़ हैं
कोई रस्म ही जो बुरी लगे उसे शानदार किया करो
मैं खुली किताब ही हूँ उसे भी पढ़ा करो कभी हम-नशीं
जो भी राज़ है मेरे बोलके कभी राज़दार किया करो
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