aankhoñ se mohabbat ke ishaare nikal aa.e | आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए

  - Mansoor Usmani

आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए
बरसात के मौसम में सितारे निकल आए

था तुझ से बिछड़ जाने का एहसास मगर अब
जीने के लिए और सहारे निकल आए

मैं ने तो यूँँही ज़िक्र-ए-वफ़ा छेड़ दिया था
बे-साख़्ता क्यूँँ अश्क तुम्हारे निकल आए

जब मैं ने सफ़ीने में तिरा नाम लिया है
तूफ़ान की बाहोँ से किनारे निकल आए

हम जाँ तो बचा लाते मगर अपना मुक़द्दर
इस भीड़ में कुछ दोस्त हमारे निकल आए

जुगनू इन्हें समझा था मगर क्या कहूँ 'मंसूर'
मुट्ठी को जो खोला तो शरारे निकल आए

  - Mansoor Usmani

Shama Shayari

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