सभी ज़ख़्म मुरझा गए हैं हमारे कभी भी किसी में खिलेंगे नहीं हमबता कर गया है खुले ज़ख़्म रखनाकभी ज़ख़्म अपने सिलेंगे नहीं हम— Manish watan