मैं पहले मुस्कुरा कर देखता हूँ
हँसी को आज़मा कर देखता हूँ
नहीं जब बात बन पाती हँसी से
तो फिर बातें बना कर देखता हूँ
असर बातों का भी जब बे’असर हो
ख़ुराफ़ातों पे आ कर देखता हूँ
ख़ुराफ़ातों का पर्दाफ़ाश हो जब
हर इक ख़्वाहिश मिटा कर देखता हूँ
मचल उठती हैं सारी ख़्वाहिशें जब
मैं दो रुपए कमा कर देखता हूँ
महज़ दो चार दिन जीने की ख़ातिर
जतन क्या क्या उठा कर देखता हूँ
कभी उँगली उठा कर देखता था
अब आईना उठा कर देखता हूँ
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