bosa to us lab-e-sheereen se kahaan milta hai | बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है

  - Nizam Rampuri

बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है
गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी

  - Nizam Rampuri

Kiss Shayari

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    बोसा कैसा यही ग़नीमत है
    कि न समझे वो लज़्ज़त-ए-दुश्नाम
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    Bahadur Shah Zafar
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    लुटाते हैं वो दौलत हुस्न की बावर नहीं आता
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    तेरे होंटों पे रक़्स करता है
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    मैं ने बोसा अभी लिया नहीं है

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    मेरे लब पर भी इल्तेजा नहीं है

    जो भी होना था हो चुका काज़िम
    अब किसी से हमें गिला नहीं है
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    Sheikh Ibrahim Zauq
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    इस जलेबी में क़ंद ओ शक्कर है
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    Raj

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    मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप
    Nizam Rampuri
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