सफ़ीने को किनारे से भँवर इक मोड़ देती है
हवा जब तेज़ चलती है इमारत तोड़ देती है
मुहब्बत सात पर्दों में जिगर महफ़ूज़ रखती है
क़ज़ा जब चिलचिलाती है तो पर्दे तोड़ देती है
क़लम हो या क़दम हो या क़सम हो आपकी कोई
हवा जब साथ होती है तो हर शय जोड़ देती है
मुसाफ़िर हैं तो अपनी हद ज़रा पहचान के चलिए
इबादत को इबादत से इबादत तोड़ देती है
बहुत ज़िद मत करो रे चाँद को सूरज बनाएँगे
वगरना धूप पड़ती है तो मिट्टी छोड़ देती है
ये भी सच है मुहब्बत सात पर्दों में पनपती है
ये भी सच है क़यामत सात पर्दे तोड़ देती है
तू ख़ुद महफ़ूज़ रखना अपने बंदों को मेरे मौला
सुना करते थे कुछ पौधों को मिट्टी फोड़ देती है
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