सफ़ीने को किनारे से भँवर इक मोड़ देती हैहवा जब तेज़ चलती है इमारत तोड़ देती हैमुहब्बत सात पर्दों में जिगर महफ़ूज़ रखती हैक़ज़ा जब चिलचिलाती है तो पर्दें तोड़ देती है— Rakesh Mahadiuree