हमारे बिन तुम्हारे दिल की हालत कौन समझेगा
जहाँ तक हम समझ लेंगे ये वहशत कौन समझेगा
बिताई उम्र है मैं ने किसी ज़ालिम की चाहत में
अगर हम ही नहीं समझे मुहब्बत कौन समझेगा
कभी धीरे से आ बैठो किसी के मन के मन्दिर में
यूँँ ही चढ़कर पुकारोगे तो शिद्दत कौन समझेगा
तुम्हारे हाथ में इक दिन किसी का हाथ था जानी
तुम्हीं गर अब न समझोगे तो राहत कौन समझेगा
सर-ए-महफ़िल यूँँ उठकर के हमारे पास मत आओ
तुम्हारे बिन तुम्हारे दिल की हालत कौन समझेगा
हमारी लाश को यारों ज़मी में दफ़्न मत करना
हमेशा महके ही तुर्बत तो तुर्बत कौन समझेगा
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