chaudhvin shab ko sar-e-baam vo jab aata hai | चौदवीं शब को सर-ए-बाम वो जब आता है

  - SALIM RAZA REWA

चौदवीं शब को सर-ए-बाम वो जब आता है
माह-ए-कामिल भी उसे देख के शरमाता है

 
मैं उसे चाँद कहूँ फूल कहूँ या शबनम

उसका ही चेहरा हर इक शय में नज़र आता है
 

रक़्स करती हैं बहारें भी तेरे आने से
हुस्न मौसम का ज़रा और निखर जाता है

कितने अल्फ़ाज़ मचलते हैं सँवरने के लिए
जब ख़यालों में कोई शे'र उभर आता है

 
मैं मनाऊँ तो भला कैसे मनाऊँ उसको

मेरा महबूब तो बच्चों सा मचल जाता है
 

जब उठा लेती है माँ हाथ दु'आओं के लिए
रास्ते से मेरे तूफ़ान भी हट जाता है

  - SALIM RAZA REWA

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