तू ग़म भेज दे या ख़ुशी भेज दे
मेरे हक़ में है जो वही भेज दे
मुअत्तर बना दे फ़ज़ाओं को जो
हवाओं में वो ताज़गी भेज दे
मिटा दे जो नफ़रत की हर तीरगी
चराग़ों को वो रौशनी भेज दे
नहीं कोई बख़्शिश कि सामाँ ख़ुदा
मेरे घर कोई मुत्तक़ी भेज दे
सुना कर जिसे ख़त्म हो नफ़रतें
मोहब्बत की वो बाँसुरी भेज दे
फ़ज़ाओं में महके ये मेरा सुख़न
ख़यालों में वो शायरी भेज दे
हर इक शय को जिसने है पैदा किया
वो पत्थर में भी ज़िंदगी भेज दे
जो ख़्वाबों में आती है अक्सर मेरे
हक़ीक़त में भी वो परी भेज दे
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