हर एक शय से ज़ियादा वो प्यार करता है
तमाम ख़ुशियाँ वो मुझपर निसार करता है
मैं दिन को रात कहूँ वो भी दिन को रात कहे
यूँँ आँख मूँद के वो ए’तिबार करता है
मैं जिसके प्यार को अब तक समझ नहीं पाया
तमाम रात मेरा इंतिज़ार करता है
हमें तो प्यार है गुल से चमन से ख़ुश्बू से
वो कैसा शख़्स है फूलों पे वार करता है
मुझे उदास निगाहों से देखना उनका
अभी भी दिल को मेरे बेक़रार करता है
उसे ही ख़ुल्द की नेमत नसीब होगी ‘रज़ा’
ख़ुदा का ज़िक्र जो लैल-ओ-नहार करता है
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