
मैं उसे चाँद कहूँ फूल कहूँ या शबनम
उस का ही चेहरा हर इक शय पे नज़र आता है
दूर हो जाती है दिन भर की थकन पल भर में
जब मेरा लख़्त-ए-जिगर आ के लिपट जाता है
— SALIM RAZA REWA
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