जहाँ चैन था मेरी आवारगी को
ये दिल याद करता है फिर उस गली को
न दिल आने देता है दिल में किसी को
करे कौन पूरी तुम्हारी कमी को
बहुत दिन हुए उस की सूरत न देखी
निगाहें तरसने लगी ताज़गी को
नहीं लुत्फ़ इस
में रहा कुछ भी तुम बिन
चलाए रखा है मगर ज़िन्दगी को
मुहब्बत किसे खारे पानी से होगी
समुंदर की चाहत तो है बस नदी को
मसल दी गई माँ की ही कोख में जब
कहाँ फिर ठिकाना मिले उस कली को
ठहर कर ज़रा सोचे अच्छा बुरा क्या
कहाँ इतनी फ़ुर्सत है अब आदमी को
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